वैक्सीन 50 - नकारात्मक समय में सकारात्मक पुस्तक - राजेन्द्र भानावत, पूर्व आईएएस


बहुत कम ऐसी पुस्तकें होती हैं, जिन्हें एक बार पढऩा प्रारंभ करने के बाद तब तक नीचे रखने की इच्छा ही नहीं होती, जब तक उसे पूरा नहीं पढ़ लें। यही मेरे साथ हुआ जब मैंने नवीन जैन द्वारा लिखित पुस्तक वैक्सीन 50 पढऩी प्रारंभ की।

यदि किसी के परिवार या रिश्ते में कोई कोरोना से संक्रमित हुआ या जो कोरोना के दुष्प्रभाव और असीमित विस्तार से भयभीत होकर नकारात्मक विचारों से ग्रसित हो गया हो, संयोग से बहुसंख्यक लोग इसी श्रेणी में आते हैं, उसे यह पुस्तक अनिवार्यत: पढऩी चाहिए। इसलिए नहीं कि इसमें अभिप्रेरित करने वाले पचास मंत्र, 50 अध्यायों के माध्यम से दिए गए हैं, अपितु ये सभी इतने सरल, सहज, रुचिकर भाषा में लिखे गए हैं कि ये सब आपके दिलों की गहराइयों में उतरने की क्षमता रखते हैं।

लेखक ने अपने अनुभव, कोरोना काल से उपजी विषम परिस्थितियों और उससे संबंधित प्रेरक प्रसंग, शास्त्रों से ली गई कथाओं का चित्रण इतने संश्लेषण के साथ किया है कि देखते ही बनता है। प्रत्येक प्रसंग का चयन अत्यंत सटीक है। प्रत्येक अध्याय का अंत एक ऐसे संदेश या मंत्र के साथ होता है कि पाठक को लगता है कि वह बात उसे ही कही जा रही है और उसके लिए एकदम सही प्रतीत होती है।

पुस्तक में से कुछ प्रसंग उद्घृत करना उपयुक्त होगा -

प्रसिद्ध सूफी संत राबिया और हसन के बीच वार्तालाप का अंत इन शब्दों से होता है, 'जो तुम कर सकते हो, वह हर मछली कर सकती है और जो मैं कर सकती हूं, वह हर मक्खी कर सकती है, आओ हम यहां बैठकर इंसानों की तरह खुदा की बात करें।' संदेश है कि वही लोग दुनिया में ऊपर उठ सकते हैं, जो जमीन से अच्छे जुड़े रहते हैं। समुद्र के किनारे रेत के घर बनाने वाले बालक और बड़ा रिसॉर्ट बनाने वाले की सोच की तुलना करते हुए लेखक संदेश देता है कि हम यह सोचेंगे कि यह सब मेरा है, धरती मेरी है तो वह दुख देने वाला है और कोरोना वायरस ने हमको यही संदेश तो भर-भर दिया है कि कुछ भी हमारा नहीं है। 'संघर्ष से ही आंतरिक शक्ति का विकास होता है' वाले अध्याय में तितली को कोकून से शीघ्र निकालने हेतु कोकून को चाकू से काटने का उदाहरण देते हुए लेखक संदेश देता है कि यह झूठा अहसास है कि हम किसी का संघर्ष कम करके उसकी जिंदगी को आरामदायक बना सकते हैं। स्वयं सावधानी बरत कर दूसरों को बचाने के महत्त्व को लेखक के ये शब्द खूबसूरती से बयां करते हैं, 'हम इस प्रकार की सोसाइटी में रहकर क्या करेंगे, जहां हम तो बहुत शक्तिशाली होंगे परंतु हमारे आस-पास पर्याप्त मात्रा में लोग ही नहीं होंगे, जो आपके उस शक्ति प्रदर्शन को देख सकें।'

'संवेदनशीलता ही दुनिया को रहने लायक बनाती है' शीर्षक के अध्याय का अंत इस मंत्र से होता है कि 'हमें किसी भी स्थित को पूरी तरह से विश्लेषण किए बिना मात्र खुद को सही साबित करने के उद्देश्य से लोगों के बीच जहर नहीं फैलाना चाहिए।'

एक अध्याय में जब एक सेठ किसी प्यासे को पानी इसलिए नहीं पिलाता है कि घर में काम करने वाला कोई आदमी नहीं हो तो प्यासे व्यक्ति का यह वाक्य बहुत बड़ी सीख दे जाता है- 'सेठजी! थोड़़ी देर के लिए आप आदमी बन जाइए।'

इसी प्रकार के लगभग 100 रोचक, प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख इस पुस्तक में पढ़कर कोरोना काल जैसे विपरीत समय में भी पाठकों में सकारात्मक ऊर्जा का संचरण कर देता है।

पुस्तक का शीर्षक वैक्सीन 50 भी अत्यंत सटीक है। ये सभी संदेश कोरोना से लडऩे और बचाव का वैसा ही काम करेंगे, जैसे वैक्सीन करती है, बशर्ते इन्हें अपनाकर जीवन में उतारा जाये।

कुल मिलाकर नवीन जैन की यह पुस्तक न केवल अत्यंत पठनीय और प्रेरणास्पद है, अपितु वर्तमान समय में अत्यंत सामयिक और उपयोगी है। आशा है सब इसे बढ़कर वर्तमान के कठिन समय में स्वयं को अधिक सशक्त और समर्थ बनाएंगे।

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