वो मेरा आईना था - के के पाठक, आईएएस



कोई बहुप्रसारित उक्ति है- 
"रिश्ते भी आईने की तरह ही होते हैं, 
वैसे ही हमराज, वैसे ही नाजुक, 
फर्क़ ये है कि आईने अक्सर गलतियों से टूटते हैं 
और रिश्ते गलतफहमियों से,
इसलिए जिंदगी में आईने की तरह ही
गलतफहमियों को साफ रखना सीखो,
अपनी गलतियों पर माफ़ी माँग लो 
और दूसरों की गलतियों को माफ़ करना सीखो."

उसने सुना, तो अपने ही उधेड़बुन में कुछ कहा- 
वो मेरा आईना था,
जिन दिनों मैं कामयाबी में चहकती,
वह पारदर्शी हो जाता, 
पानी की तरह, हवा की तरह दूर रहता, 
मगर मेरी दुनिया को मेरे सामने ला देता
और
जब मैं मुश्किलों से गुजरती,
उन रातों में वो मेरी दिये की लौ के पीछे 
बस एक आईना बन जाता, पास रहता, 
और मेरी रोशनी की चौगुनी कर जाता.

वह अपनी खुशियों में काँच की तरह रंगीन होकर जड़ जाता
मगर अपने गमों में चटककर छिटककर खुद रास्ते से दूर हो जाता. 
जब मैं दुनिया में मशरूफ और मशहूर होती, 
उसके सामने ही सज सँवर कर जाती, 
मेरे बरअक्स होकर भी वह कभी मुझसे ये न कहता-
"तुम मेरी हो।"
मगर जब मैं दुनिया में परेशान और तनहा होती,
वह काँच का प्याला बनकर आता और कहता-
"मैं तुम्हारा हूँ."  

वह मुझे ही प्रतिबिंबित करता और मेरे ही सामने करता 
मगर कभी ऐसा न हुआ कि मैं रोती, तो वो न रोता.  
ऐसा जाने कितनी बार हुआ, 
मेरे आँसुओं से ज्यादा भाप उसके चेहरे पर थी
और मेरी खिलखिलाहट से अधिक चमक उसके अंतस् में थी.

मैं जब जिंदगी में पीछे देखती, 
तो वहाँ बस गुजरे वक्त का हिसाब होता, 
जहाँ न कुछ बदल सकता, न कोई बदल सकता, 
मगर जब मैं आईने के सामने देखती, 
तो उसमें लम्हों की किताब दिखती 
और वह मेरे ही अक्स से ये सबक देता-
तुम बदल सकती हो, वक्त बदल सकता है.

सचमुच वह दर्पण था, तथागत था, आदर्श था,
वह मिलता तो ऐसे कि स्वागत सभी का करे,
मगर संग्रह जरा भी न करे. 
एक दिन उससे कहा- 
"तुम दुनिया भी दिखाते हो और दिल भी,
तुम शोख़ भी हो और नाज़ुक भी,
जरा सी चोट से चटकते भी हो 
और जरा तेज आँच में पिघलते भी हो,
तुम मुझ जैसे भी हो और मेरे दोस्त से जैसे भी हो.
सोचती हूँ, मैं क्या करूँ कि मैं खुद आईना बन जाऊँ, 
जो मुझसे किसी भी रिश्ते वास्ते से जुड़ें, 
वे मेरे भीतर शीशे की पारदर्शिता पायें. 

तुममें तो सच की ताक़त भी है और ख्वाबों की नजाकत भी. 
कहते हैं, जिस साँच को आँच से डर नहीं,
उसको भी काँच की दरकार है,
मगर काँच को तो पत्थरों से डर भी है.
मैं डरती हूँ, क्योंकि यहाँ मेरे हाथों में काँच का मुक़द्दर है 
और जहाँ में हर एक हाथ में पत्थर है. 

वो बोला- 
"तुम मुझसे ख्वाबों और खूबसूरती के बरअक्स हकीक़त के जहाँ का जवाब चाहती हो,
आदमी और उसके रिश्तों पर मेरा बयान चाहती हो,

देखो,  
लोग मेरे पास सच को जाँचने नहीं, 
अक्स को सँवारने के लिए आते हैं,
मैंने उनकी आँखों में अक्सर खौफ कम, 
ख्वाब अधिक देखे हैं.

सच को तलाशने और खूबसूरती को तराशने में अक्सर फर्क़ होता है.
जब तुम खूबसूरती के साथ होगी,
तेरी चाह में हर आँख आईना बनने को बेकरार होगी 
और जब सच के साथ होगी, 
हर हाथ तेरी राह में शीशे बिखेरने को तैयार होंगे. 

देखो, आदमी आईने की तरह जरूर होता है,
मगर वह मौलिक है, प्रतिच्छवि नहीं. 
तुम हमसे बेहतर सच्चे बन सकते हो, 
क्योंकि तुम्हारी किसी की छवि बन रहने की नियति नहीं, 
किसी का पूरा प्रतिबिंब ही बन जाने की अपेक्षा नहीं. 
तुम स्वगत बन सकते हो, यदि न बन सको तथागत तो।

और तुम्हारा सच ऐसा हो,
जिसे न आँच का डर हो, न काँच की दरकार हो।
हम टूटते हैं, चटकते हैं, बिखरते हैं, 
फिर भी सच ही बोलते हैं। 
और जब तुम काँच नहीं, तब तुम बेहतर निडर हो सकते हो, 
और अगर कभी कहीं तुम्हारे अंतस् का काँच जमाने की चोट से चटक ही जाएँ,
तो उन्हें अपने जज़्बे की आँच में पिघलाना सीख लो.
वे गल कर फौलाद न भी बने, 
तो फिर से बन सकेंगे शीशा, आईना, 
वे जो सत्य के हेतु हैं 
और जो न बन सके ये, 
तब भी बन सकते हैं, प्याला, चूड़ी, झूमर, शीशमहल के मानिक, 
वे जो सौंदर्य के, आनंद के हेतु हैं। 

जीवन का आदर्श है, 
जब देखना हो, अपने अंतस् में, 
सम्यक् तथागत दर्पण बन जाना, 
जब दिखाना हो, जगत्, बाहर, 
पारदर्शी शीशा हो अदृश्य हो जाना. 
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