युवा भारत की खोज


‘निजी तौर पर मेरा मानना है कि गांव के युवा को भी वही हाई स्पीड इंटरनेट मिलना चाहिए, जो शहरी युवा को मिल रहा है। क्योंकि प्रतिभाएं गांवो में छिपी हैं। आज हर छोटी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर गांवों से प्रतिभाएं उभर कर सामने आ रही हैं। तकनीक गांवों तक पहुंचेगी, तो ग्रामीण युवाओं को प्रोत्साहन मिलेगा।’

विकसित राष्ट्रों की तर्ज पर भारतीय दूरसंचार जगत में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। तकनीक भविष्य की तस्वीर बुनने में जुटी है और इस प्रयास में अपना योगदान दे रहे हैं मंझे हुए ऑफिसर्स। दुनियाभर में ऑप्टिकल फाइबर का बोलबाला बढ़ रहा है। जापान, अमरीका और चीन जैसे राष्ट्र ऑप्टिकल फाइबर पर जबरदस्त काम कर चुके हैं। इसी तर्ज पर भारतीय सरकारी और गैर-सरकारी कंपनियां अपने प्रयास शुरू कर चुकी हैं।
क्या है तकनीक!
हाई स्पीड इंटरनेट, गेमिंग, हाई रिजॉल्यूशन टीवी और तकनीक के हर पक्ष में स्पीड चाहने वालों की ख्वाहिश को पूरा करती है ऑप्टिकल फाइबर केबल तकनीक। पहली बार 1980 के दशक में ऑप्टिकल फाइबर को विकसित किया गया। पहली ट्रांसट्लैण्टिक टेलीफोन केबल को टीएटी-8 के नाम से जाना गया, जिसका पहली बार उपयोग 1988 में किया गया। टेलीकम्यूनिकेशन सिस्टम को बेहद मजबूत बनाने वाली इस तकनीक को लेकर लगातार प्रयोग हुए। मौजूदा फाइबर केबल्स में एक ही केबल में हजारों फाइबर के विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें प्रति सैकंड टैट्राबाइट बैंडविथ क्षमता होती है। जापान और दक्षिण कोरिया में इसका फाइबर टू द होम के जरिए जबरदस्त उपयोग लिया जा रहा है। पवन चक्कियों से बिजली बनाने में भी ऑप्टिकल फाइबर का उपयोग हो रहा है। 2020 में दुनिया की कुल बिजली खपत का 12 फीसदी हिस्सा पवन चक्कियों से ऑप्टिकल फाइबर के जरिए घरों तक पहुंचेगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर से मिल रही कामयाबी
मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की यूएसपी बनाए बाजार में बीएसएनएल इस नई योजना को लेकर अब भी आगे है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, तकनीक में नित नए बदलाव, युवा भारत की अपेक्षाएं सभी को एक सूत्र में पिरोने में जुटे हैं भारतीय दूरसंचार सेवा के 1977 बैच के अधिकारी और बीएसएनएल के प्रधान महाप्रबंधक प्रदीप के. अग्रवाल। अग्रवाल जापान और अमरीका में उपयोग में लाई जा रही तकनीकों को भारत के गांवों तक पहुंचाने के मिशन में शामिल हैं। वे कहते हैं, ‘हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर है। तकनीक है। फिर क्यों नहीं शहरों में अंगड़ाई ले रही क्रांति का एहसास गांवों तक पहुंचाएं। जिस तरह पहले टीवी के लिए घरों पर एंटीना लगता था, फिर केबल टीवी आया और देखते ही देखते डिश टीवी आ गया। ...लेकिन डिश टीवी के बाद क्या? बस यहीं से शुरुआत हो जाती है ऑप्टिकल फाइबर तकनीक की। कुछ ही सालों में आप पाएंगे कि जिस तरह घरों से केबल गायब हुई, उसी तरह छतों से छतरियां गायब हो जाएंगी और चारों तरफ ऑप्टिकल फाइबर का बोलबाला होगा। यही भविष्य है।’

ऐसे चला सिलसिला
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रूड़की से इलेक्ट्रोनिक्स और कम्यूनिकेशन में बी.ई. (1977) करने के बाद अग्रवाल सीधे भारतीय दूरसंचार सेवा के जरिए संचार और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन आए। अपने शुरुआती 19 साल प्रोजेक्ट, प्लानिंग और डेवल्पमेंट को दिए। जनवरी 1998 में नई दिल्ली स्थिति टेलीकॉम इंजीनियरिंग सेंटर में डिप्टी डायरेक्टर जनरल के पद पर पहुंचे। करीब सवा दो साल की यहां सेवा के बाद अग्रवाल अप्रेल 2000 में एमटीएनएल, दिल्ली में जनरल मैनेजर बने। यहां पश्चिम दिल्ली के विशाल टेलीकॉम नेटवर्क इंचार्ज रहे। अगला पड़ाव ज्यादा जिम्मेदारियों के साथ आया। अग्रवाल को टेलीकम्यूनिकेशंस कंसलटेंट्स इंडिया लिमिटेड में ग्रुप जनरल मैनेजर का पद जनवरी 2003 में मिला। यहां पैन अफ्रीका प्रोजेक्ट संभाला, जिससे 53 देशों का ताल्लुक था। नेशनल इंटरनेट बैकबोन के तहत दिल्ली, मुंबई, पूना और बंगलुरू को लेकर 355 करोड़ का प्रोजेक्ट लिया। यह निजी कंपनियों को पीछे छोडऩे की मिसाल बना। फाइबर टू होम से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए अग्रवाल कुवैत गए। जेनेवा, काईरो, ट्यूनिशिया, शिकागो और अटलांटा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भाग लिया। अग्रवाल जून 2006 में बीएसएनएल जयपुर में सीनियर जनरल मैनेजर बने। अगस्त 2008 में यह सिलसिला प्रिंसिपल जनरल मैनेजर तक पहुंचा, जो अब तक बड़ी जिम्मेदारियों के साथ बदस्तूर जारी है।

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