जज्बे से जीती जंग !


प्रशासनिक पारदर्शिता की जीवंत मिसाल देखनी हो, तो जयपुर के पासपोर्ट ऑफिस जरूर आइए। हमेशा की तरह लंबी कतारें, पब्लिक का हल्ला, कर्मचारियों रुखा-सूखा फीडबैक और ऐसी ही ढेर सारी शिकायतों की अब यहां कोई जगह नहीं रही। करीब छह साल पहले हुई एक छोटी सी शुरुआत आज एक मिशन का रूप ले चुकी है। अब यहां शिकायतों की जगह समाधान मिलता है। लंबी कतारों की बजाय, जज्बे से भरी टीम और वक्त की पाबंदी से भरपूर, सेवाभाव का माहौल मिलता है। ...और यह संभव बनाया 1999 बैच के आईएफएस अधिकारी श्रवण कुमार वर्मा ने।
जनवरी 2007 में बतौर पासपोर्ट अधिकारी जयपुर तैनात हुए वर्मा को शुरुआती दौर में जबरदस्त शिकायतों का सामना करना पड़ा। तब आलम यह था कि आवेदक या तो चक्कर लगाते रहते या फिर थक हार कर पासपोर्ट बनाने का विचार त्याग देते थे। लेकिन अब परिस्थितियां अलग हैं। हर रोज दूर-दराज से आने वालों की तकनीकी, कागजी और प्रक्रिया अंतर्गत छूटी त्रुटियों को पूरा करवाने में वर्मा खुद सहयोग करते हैं। क्रमबद्ध तरीके से हर रोज सुनवाई करते हैं और समस्या का तुरंत समाधान मुहैया करवाते हैं। इस प्रक्रिया में न वक्त आड़े आता है, न ही थकान। आलम यह है कि वर्मा के ऑफिस में अब किसी भी टेबल पर फाइलों का अंबार नहीं मिलता। हर टेबल पर फाइल का वक्त तय है। 
देशभर में पासपोर्ट आवेदकों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर केन्द्रीय मंत्रीमण्डल की ओर से पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) प्रणाली के तहत टीसीएस के साथ गठजोड़ किया गया। इसी गठजोड़ के तहत देशभर में टीसीएस को 77 पासपोर्ट सेवा केन्द्र खोलने की अनुमति मिली। इनमें से 39 खोले जा चुके हैं और बाकी पर तेजी से काम हो रहा है। इसी प्रक्रिया के तहत राजस्थान में जयपुर, सीकर और जोधपुर में काम शुरु हुआ है। वर्मा कहते हैं, ‘टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के साथ जुड़ाव के बाद पासपोर्ट की प्रक्रिया ज्यादा फास्ट हो गई है। अब हर विंडो पर फाइल का समय तय है। इससे फार्म जमा करवाने से लेकर पासपोर्ट घर आने तक समय की बचत हो रही है।’ वर्मा ने जनवरी 2007 में कार्यभार संभाला। जयपुर में इससे पहले किसी भी वर्ष 1.36 लाख से ज्यादा पासपोर्ट नहीं बने थे। लेकिन काम को शृंख्लाबद्ध करने की वर्मा ने ऐसी प्रक्रिया विकसित की, जिससे कम कर्मचारियों में ज्यादा आउटपुट सामने आया। ताजा आंकड़ों को देखें, तो अब हर साल 2.15 लाख से ज्यादा पासपोर्ट यहां बनाए जा रहे हैं। हालांकि वर्मा प्रयासरत हैं कि टीम बढऩी चाहिए, लेकिन पल भर के लिए भी वे अपनी मौजूदा टीम के जज्बे से जुदा नहीं होते। वर्मा के अनुसार, ‘पासपोर्ट आवेदन जिस अनुपात में बढ़े हैं, उस अनुपात में कर्मचारी और अधिकारी हमें नहीं मिल पाए हैं। प्रयास जारी हैं। लेकिन इस सफलता का श्रेय पूरी टीम को है, जो समर्पण भाव और जज्बे के साथ जुटी हुई है।’
वर्मा की बेहतरीन कार्यप्रणाली का असर महज पासपोर्ट बनाने तक ही सिमटा हुआ नहीं है, बल्कि सुरक्षा, व्यवस्था और पारदर्शिता के मामले में भी हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब मजबूत सुरक्षा इंतजामों के साथ हर काम पूरा किया जाता है। 31 सीसीटीवी कैमरों, कागजात के बेहतरीन चैकिंग किसी भी स्तर पर चूक की संभावना को खत्म करती है। साथ ही सेवाभाव भी यहां जैसे रगों में बसता है। वर्मा कहते हैं, ‘वास्तव में पासपोर्ट बनाना सच्ची मानव सेवा है। कई लोग अपने बूढ़े माता-पिता और गोद में लिए छोटे बच्चों के पासपोर्ट बनवाने आते हैं। हज जाने की ख्वाहिश लिए बुजुर्ग आते हैं। अगर हमारे प्रयासों से ऐसे ही किसी के चेहरे पर जरा सी खुशी देखने को मिले, तो इससे बड़ी मानवता की सेवा और क्या होगी।’
ठीक तौर पर देखा जाए, तो वर्मा के ऑफिस में कामकाज की प्रणाली पर पारंपरिक सरकारी प्रणाली का ठप्पा नजर नहीं आता। यहां सुबह साढ़े नौ बजे से शुरु होने वाला सिलसिला शाम साढ़े पांच बजे ही नहीं सिमट जाता, बल्कि सुनवाई और समाधान की प्रक्रिया में कार्यालय की पूरी टीम वर्मा के साथ तब तक डटी रहती है, जब तक यहां आया हुआ आखिरी व्यक्ति संतुष्ट होकर नहीं लौटता। इसे प्रबंधन की मिसाल कहें या फिर एक सिस्टम की उपयोगिता बताती जीवंत केस स्टडी। हालात को परखें, तो वर्मा ने रेगिस्तान में पानी की धारा निकालने जैसा काम किया है। ...और एक ऐसी जंग जीती है, जो टीम भावना और जज्बे के बिना नहीं जीती जा सकती।
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2 comments:

  1. Mr.SK Verma is such a nice officer.I can say "He is man like anything".Superb personalty as well as bold officer who can face any person in well manners.I wish him a success.
    Dr.Mahesh Agarwal
    Reporter
    Hindustan Times
    Bhilwara region
    9829047848

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