आई.ए.एस. – काव्य कृति


प्रशासनिक सेवा में आने के वर्षों बाद
एक दिन मिला एक पुराना मित्र
बोला – यार तुम तो वैसे के वैसे हो
बिलकुल नहीं बदले
लगता ही नहीं इतने वर्षों से आई.ए.एस. हो।
मैं चकित हुआ- पूछा
क्या सींग उगने चाहिए थे?
वह बोला – नहीं यार, फिर भी
कैसे आई.ए.एस. हो तुम
सब से अब भी हंसकर बोलते हो
देखकर मुंह नहीं मोड़ते
सीधी सरल बात करते हो
नेताओं के चक्कर नहीं लगाते
पैसा नहीं बनाते
बीवी तुम्हारी लूना चलाती है
साधारण सी साडिय़ां पहनती है
कितने बेवकूफ हो तुम?
क्या फरक पड़ता – यदि
थोड़ा पैसा बना लेते
बीवी को सरकारी गाड़ी में घुमा लेते
नेताओं की हां में हां मिला लेते
तुम्हारे पास भी आलीशान बंगला होता
गिफ्ट लाने वालों की लम्बी कतार होती
घर में बड़ी सी कॉन्टेसा कार होती।
भाई, कुछ भी कहो, तुम आई.ए.एस. होकर
…भी आई.ए.एस. नहीं बन पाए
मित्र के जाने के बाद यह सोचकर
मन हुआ बड़ा व्यथित, विचलित
कि यह कैसी धारणा है, आई.ए.एस. के बारे में
वे लोग जो देश का तंत्र चलाते हैं
वे ऐसे ही गुणों से क्यों परिपूर्ण हैं?
क्या सरल, सहज, जनहितकारी व्यवहार
आई.ए.एस. के लिए संभव नहीं?
(यह काव्य कृति वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजेन्द्र भाणावत द्वारा रचित है। भाणावत रीको के प्रबंध निदेशक हैं।)
Share on Google Plus

About Officers Times

0 comments:

Post a comment